साली की चुदाई करके उसकी इज्जत बचाई

(Sali Ki Chudai Karke Uski Ijjat Bachayi)

हमारे साथ जो कुछ गलत होता है, अनर्थ होता है। उसके पीछे हमारी गलत सोच ही अपनी अहम भूभिका निभाती है। हम अपनी गलती का कभी स्वीकार नहीं कर पाते और दूसरों पर दोष थोपकर किनारा कर जाते हैं।

शादी के बाद मैं अपनी साली शिवांगी के निकट परिचय में आ गया था, वह मेरी बीवी से उम्र में केवल एक साल छोटी थी। लेकिन उसका यौवन उभार उसे बड़ा ही सेक्सी लुक प्रदान करता था। उसका रंग थोड़ा श्यामल था। हम लोग पड़ोस में ही रहते थे। इसी वजह से लगातार हमारा आमना-सामना होता रहता था और बातचीत के मौके मिलते थे।

हालात भी हमारे सहवास को बढ़ावा दे रहा था। वह थोड़ी बातूनी टाईप की लड़की थी। मैं उसके प्रति आकर्षित हो गया था, शायद यह प्यार था। मैं उस वक्त यह बात जानता नहीं था। मैं उसका बड़ा ख्याल रखता था। उसकी हर बात के लिए चिंतित होता रहता था।

मेरी शादी को एक साल से अधिक समय बीत चुका था और उसी दौरान मैं एक बच्चे का पिता भी बन गया था। इधर हम दोनों की नजदीकियां भी बढ़ गई थीं। एक मर्तबा मैं अपनी ससुराल के सदस्य के साथ एक हिल स्टेशन पर घूमने गया था, उस वक्त मेरी बीवी पेट से थी। उसी वजह से मेरी बीवी हम सभी के साथ नहीं आ पाई थी।

मैं करीब दस दिन उन सभी के साथ रहा था। उस दौरान मैं और शिवांगी दोनों एक-दूजे के काफी करीब हो गए थे। हम दोनों अपनी सभी बातें शेयर करते थे। खाने-पीने की या अन्य सामग्री की खरीदी करने के लिए हम लोग साथ में बाजार भी जाते थे।

वह बीए के फाईनल ईयर में थी और मैं एल एल बी कर रहा था। हम दोनों साथ मिलकर रात देर तक पढ़ाई करते थे।

सगे बाप-बेटी को भी अकेले में ज्यादा समय साथ नहीं रहना चाहिए, यह बात मैंने कहीं पढ़ी थी। लेकिन शिवांगी की मौजूदगी और उसके सुखद सहवास में मैंने इस बात को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया था। साली-जीजा के नाते हम दोनों के बीच मस्ती-मजाक और शारीरिक छेड़छाड़ का दौर भी जारी हो गया था।

रात को एक बार पढ़ते-पढ़ते शिवांगी ने मुझसे कहा- जीजू.. मैं एक झपकी ले लेती हूं। आप मुझे ठीक मुझे दस मिनट के बाद जगा देना।

वह मेरे सामने ही आराम कुर्सी पर बैठकर पढ़ रही थी। वह उसी पर आँख बंद करके सो गई। उसी वक्त मेरी नजर उसके भरे-पूरे उरोजों से जा टकराई थी। दोनों उरोज के बीच की गली साफ दिखाई दे रही थी। उसके मदमस्त उभार मानो मुझे आमंत्रित कर रहे थे। उसे देखकर मेरा ध्यान पढ़ाई से हट गया। उसके दूध मुझे लुभा रहे थे.. उत्तेजित कर रहे थे।

इसके पहले कई बार मैंने शिवांगी के मम्मों को चोरी-छुपे देखा था। वह यह बात जानती थी, फिर भी उसने कभी अपनी नाराजगी प्रगट नहीं की थी और न तो कोई एतराज जाहिर किया था। उसकी इस विरोध न करने वाली बात ने मेरे भीतर की कामवासना को भड़काना शुरू कर दिया।

मेरी वासना को आज अपनी मनमानी करने का मौका मिला था। शिवांगी के मदमस्त उरोजों को छूने का आज बेहतरीन मौका दिख रहा था। शायद उसने मुझे इस बात के लिए आमंत्रित किया था। पल भर के लिए मैं भी उसके इस बहकावे में आ गया था।

मुझे मालूम था कि बहुत ही कम उम्र में शिवांगी का दो लड़कों से अफेयर्स हो चुके थे। वह अपनी मां के नक्शे कदम पर चल रही थी। मैंने शिवांगी के बारे में सुना था। उसका बाप पड़ोस में रहने वाला उसकी मां का आशिक था। यह सब याद आते ही यकायक मेरा प्यार न जाने कहाँ चला गया? मुझे उस प्यार की न तो परवाह रह गई थी और न तो उसे सोचने-समझने की जरूरत थी। मैं तो बस दस मिनट खत्म होने के इन्तजार में था, कभी घड़ी पर, तो कभी कपड़ों में उसके बंधित विस्तारों को लगातार घूर रहा था।

दस मिनट बीतते ही मैंने अधीर अवस्था में उसको जगाने के बहाने से उसके एक उरोज को कसकर अपनी मुठ्ठी में कैद कर लिया। मेरे छूते ही उसकी नींद खुल गई। मैंने उसके मम्मों पर अचानक से हल्ला बोल दिया था। फिर भी उसके चेहरे पर गजब सी मुस्कान झलक रही थी। जिसने मुझे यह मानने पर विवश किया था कि मेरा उसे इस तरह छूना बेहद पसंद आया था।

उसकी बॉडी लेंग्वेंज ने मेरे भीतर के राक्षस को भी उकसा दिया था। लेकिन मेरा प्यार अब भी मेरे धैर्य की रक्षा कर रहा था।
दूसरे ही पल मैंने उसकी गोद में सर रख दिया.. तो उसने मुझसे सवाल किया- जीजू … आप को नींद आ रही है क्या?
सवाल करते हुए उसने मेरे सर को बड़े प्यार से सहलाया था और मैंने उसके मम्मों पर अपनी नाक रगड़ते हुए उसे अपने आगोश में जकड़ लिया था। उस वक्त तो वह बिना कुछ कहे चुपचाप मेरे घर से चली गई थी।

दूसरे दिन वह पढ़ाई के लिए मेरे घर आई थी। उसकी आँखों में कोई रंज या शिकायत का कहीं नामोनिशान नजर नहीं आ रहा था। मैं मन ही मन रात भर अपने व्यवहार के लिए अपने आपको कोसता रहा था।

एक घंटे के बाद वह मेरे सामने ही सोफे पर सो गई थी। उसको देखकर मेरे दिमाग पर फिर से यकायक शैतान सवार हो गया। सेक्स की भड़की हुई आग ने मानो मेरे प्यार का खून कर दिया। मेरी भीतर भावना और वासना की जंग सी छिड़ गई थी। मैंने अपने होंठों को उसकी उभरी हुई छाती पर रख दिए। वह आँख बंद करके मेरे सामने सोई पड़ी थी। इसी लिए मेरी हरकत से वह खुश थी या नाराज.. मुझे यह तय करना मुश्किल था।
उसने मुझे टोका जरूर था कि यह अच्छा नहीं हो रहा है। लेकिन उसका हाथ उसकी छाती पर स्थित सर को सहला भी रहा था। अब इस बात का भला क्या मतलब निकाला जा सकता है?

क्या सही था? उसका टोकना या उसका मेरे सर को सहलाना?
उसकी दो विभिन्न प्रतिक्रियाओं ने मेरे दिमाग में असमंजस पैदा कर दी थी।

तमाम नारी जाति के बारे में एक उक्ति प्रचलित है। वह चाहते हुए भी कभी किसी बात के लिए हां नहीं कहती। वह आपको पूर्ण रूप से सहयोग देगी। आपकी हम बिस्तर भी बन जाएगी। लेकिन अपने मुँह से कभी ऐसा इकरार नहीं करेगी। यह खुद को निर्दोष साबित करने का आम तरीका बन चुका है। गलत होना तो वह चाहती है। लेकिन चोरी पकड़े जाने के डर से वह डबल गेम खेलकर सारा दोष पुरूष पर लगाकर अपनी शराफत के ढोल पीटती है और एक मन पसंद रिश्ते को बलात्कार में तब्दील करके पुरूष की बदनामी करने में पीछे नहीं रहती है।

मेरे दोस्तो आपको क्या लगता है? शिवांगी भी ऐसी ही कक्षा में शामिल थी?

एक साली होने के नाते मैं उसे प्यार करता था। उसका बहुत ही ख्याल रखता था। हमारे बीच काम शत्रु टाँग अड़ाने की कोशिश कर रहा था। मैं उसे अपने निजी शत्रु से बचाना चाहता था। इसी लिए मैंने उसे राखी बाँधने का प्रस्ताव दिया था। मैं हमारे रिश्ते के बीच एक दीवार बनाना चाहता था। लेकिन मेरी सास ने इस मामले में खलनायिका की भूमिका निभाते हुए मेरी फीलिंग्स का अनादर किया था। जिसने मेरी भीतर के राक्षस को जगाने का कुकर्म किया था। शिवांगी अगर चाहती तो मेरा प्रस्ताव कबूल करके हमारे रिश्ते की रक्षा कर सकती थी। मेरे भीतर के राक्षस को पराजित कर सकती थी। लेकिन उसने अपनी मां की तरह भाई-बहन के रिश्ते का घोर अपमान किया था। शायद इसी हालात ने मेरे भीतर के भाई को मार डाला था। मुझे गुमराहगी के बवंडर में ढकेल दिया था।

वह एक लड़के से प्यार करने का दावा करती थी। ये लड़का उसको प्यार करने वालों के तीसरे स्थान पर था। वह बिल्कुल निकम्मा और कामचोर था। ज्यादा पढ़ा-लिखा भी नहीं था। शिवांगी को उसकी दादी मां की संपत्ति का शायद लालच था, इसी लिए वह उसको छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी। वह एक तरफ प्यार करने का दावा करती थी और हमेशा सुख-चैन और आराम की नींद सोती थी। उसका ऐसा व्यवहार देखकर मेरे दिमाग में कई सवाल खड़े हो रहे थे। मैंने भी खुले दिल से शिवांगी को चाहा था, उसे प्यार किया था। मैं उसे किसी भी हालत में खोना नहीं चाहता था। इसलिए मैंने उसे हरदम सहयोग दिया था। शायद यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी।

उसने मेरी भावना को समझने का प्रयास नहीं किया था। उसकी नादानी ने मेरी भीतर के राक्षस को उकसाया था। जिसने मुझसे शिवांगी का प्यार छीन लिया था। इसी हताशा में मैं काम राक्षस के इशारे पर नाचने के लिए विवश और मजबूर हो गया था।
मेरे सुसुप्त मन ने उस वासना का आह्वान कबूल कर लिया था। मुझे क्या करना था.. मैं खुद भी नहीं जानता था।

ऐसी ही मानसिक अवस्था में मैं उसे मिलने के लिए एक दिन उसके कॉलेज गया था। बाद में उसको वहीं के एक होटल के फैमिली रूम में ले गया, जहाँ अकसर शादी के पहले मैं अपनी बीवी को ले जाता था।

अपनी कुर्सी को शिवांगी की तरफ धकेलते हुए मैंने उससे कहा- मुझे तुम अपना हाथ दिखाओगी?
“क्यों? आप मेरा भविष्य बताओगे?”
मैंने मौन संकेत दिया और उसने अपना दाहिना हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया।

मैंने उसे रोकते हुए कहा- लड़की का बांयाँ हाथ देखा जाता है।
‘सॉरी’ कहते हुए उसने अपने बांया हाथ मेरी और आगे बढ़ाया। उसके हाथ को छूने से उस वक्त मानो मुझे बिजली का करंट सा लग गया।

पांच मिनट अपनी ज्योतिष की जानकारी का आडंबर दिखाकर मैंने शिवांगी का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर रखा।

बाद में मैंने उसे सुनहरा सपना दिखाते हुए उसको फ्लर्ट करना शुरू किया।

“तुम्हारे नसीब में तो गाड़ी बंगला नौकर-चाकर सब कुछ है।”
“आप झूठ बोल रहे हो। मेरा पिन्टू तो बड़ा गरीब है।”
“कल वह भी अमीर बन सकता है।”
“ऐसा कैसे होगा?”
“यह बात उसकी होने वाली बीवी की छाती के भीतर छिपी लकीरें बताती हैं।” मैंने सामुद्रिक शास्त्र की मदद लेकर उसे अपने जाल में लपेटना शुरू किया।
“आप क्या कह रहे हैं? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।”
“मुझे थोड़ा वक्त दे दो.. मुझ पर भरोसा रखो और जो मैं कहूं, वही करती जाओ।”
“हाँ.. बोलिए।”
“छाती की लकीरें देखने के लिए तुम्हें ब्लाऊज और ब्रा के बंधन से मुक्त होना पड़ेगा।”
“ठीक है.. आप आगे बढ़ो और जो करना है.. वह बिना झिझक पूरा करो। मैं आपको पूरा सहयोग दूंगी।”

उसकी बात सुनकर मैं उत्तेजित हो गया।

एक औरत और वह भी मेरी साली.. खुद के कपड़े निकालने की इजाजत दे रही थी।

उसी वक्त मुझे याद आया। मुझे चूचियां चूसने का बड़ा शौक था। मेरे कहने पर मेरी बीवी मुझे अपना ब्लाऊज उठाकर स्तन पान कराती है। मुझे एक क्षण के लिए उसके साथ भी यह हरकत दोहराने का ख्याल आया।

लेकिन कहीं कल जाकर उसने उल्टा वार करके मुझ पर बला त्कार का आरोप थोप दिया तो? मेरे दिल में यह सवाल जागा था। लेकिन सेक्स की आग में वह सवाल मानो जलकर खाक हो गया था।

मैंने खुशी-खुशी उसकी इजाजत का लाभ लेते हुए उसका ऊपर का अंग नंगा कर दिया।

“लकीरें देखने के साधन इस वक्त तो मेरे पास उपलब्ध नहीं है।”
“फिर क्या होगा?” शिवांगी ने मायूसी भरे अंदाज में मुझसे सवाल किया।
“तुम फिकर मत करो। पहले मैं अपने थूक से तुम्हारी छाती के हिस्से को गीला करता हूँ। बाद में तुम अपने हाथों तुम्हारा पेशाब तुम्हारी छाती पर लगा देना। यह दोनों प्रतिक्रिया एक साथ करने से तुम्हारी छाती की लकीरें साफ नजर आने लगेंगी।”
“ओह जीजू.. मैंने आपको कह तो दिया कि आपको जो कुछ करना है। आप करते जाओ। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। आप मेरी चड्डी भी निकाल सकते हो।”

मैंने पाँच दस मिनट उसकी छाती की लकीरें उकेरने के लिए उसकी चूचियों को चूस लिया। उसकी छाती की गली को अपने थूक से पूरी तरह गीला कर दिया।

बाद में उसकी चड्डी उतारकर उससे कहा- अब तुम पेशाब करो। मैं तुम्हारे ही पेशाब से तुम्हारी छाती पर मसाज करूंगा।
उसी बहाने मैंने उसकी छाती से खेलकर अपनी इच्छा पूरी कर ली।

पांच मिनट बाद मैंने अपनी राय दी- तुम फिकर मत करो। पिंटू में सब कुछ है। तुम अपने भविष्य को लेकर निश्चिन्त हो जाओ।
शिवांगी का चेहरा खुशी से खिल रहा था।

कुछ ही दिनों में उसने मानो मेरे कान में बम्ब फोड़ दिया- जीजू… मैं प्रेगनन्ट हूं और पिंटू भाग गया है।

“फिकर मत करो। मैं तुम्हारी इज्जत के बदले में तुम्हारी इज्जत की रखवाली करूंगा। बदले में तुम्हें एक काम करना होगा। तुम्हें तो मालूम है कि मैं कई दिनों से तुम्हारी दीदी के साथ सोया नहीं हूं। तुम्हें बस एक रात मेरे साथ सोना होगा। मेरे भीतर की सेक्स की आग न बुझने से बड़ा अनर्थ हो सकता है। वैसे भी तुम्हारा गर्भ ठहर गया है। इस हालत में तुम मेरा घी, अपनी चूत में जमा रख सकती हो। तुम्हारी चुत की चुदाई करने से तुमको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। घी गिरेगा भी तो खिचड़ी में, मेरी सेक्स की आग शांत हो जाएगी और किसी को कानों कान पता भी नहीं चलेगा। तुमने अगर मेरा साथ नहीं दिया तो मेरी हालत भी तुम्हारे अंकल जैसी हो सकती है। तुम्हारे अंकल सेक्स तृप्ति के लिए बदनाम बस्ती में जाते थे। वहाँ से वह क्या ले आये थे.. ये तो तुम जानती ही हो। वे सिफिलिस के मरीज हो गए थे, जो एक खतरनाक बीमारी थी। उन्होंने तुम्हारी चाची ही नहीं, बल्कि तुम्हारी बहनों को भी इस बीमारी के भेंट चढ़ा दिया था। क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारी दीदी का परिवार भी ऐसी कोई बीमारी का शिकार हो जाए?”

“मैं आपके और परिवार में ऐसा अनर्थ होने की कल्पना भी नहीं कर सकती जीजू। मैं आपकी यह जरूरत पूरी करूँगी। लेकिन हमारे बीच के इस रिश्ते की किसी को कानों कान खबर हो न पाए।”
“वह मेरी जिम्मेवारी है।”

मैं बहाना बनाकर शिवांगी को अपने घर ले आया था। उसी रात मैंने इतने दिनों की भूख और प्यास का हिसाब करके सब कुछ किया, जो पिंटू ने उसकी चुत को देकर उसे पेट से बना दिया था।

मेरा घी गिरा भी तो खिचड़ी में ही। उससे हालात में कुछ फर्क होने वाला नहीं था। इसलिए मैंने उसकी इज्जत बचाने की आड़ में उसी की इज्जत का सौदा करते हुए अपना मतलब निकाल लिया था।

एक ही महीने में उसकी शादी तय हो गई थी। शादी के पहले ही वह फिर से प्रेगनन्ट बन गई थी। सावधानी बरतने के बावजूद भी शिवांगी की यह हालत हुई थी।

शादी के सात महीने के भीतर ही उसने मेरी संतान को जन्म दिया था। जो एक लड़की थी। वह मेरी ही लड़की थी। आज दिन तक यह राज को मैंने अपने दिल में संभाल कर रखा है। शादी के बाद भी हम दोनों के बीच की नजदीकियां बनी रहीं। वह नियमित तौर पर मेरे घर आती है और हम दोनों अपने शरीर की वासना को शांत कर लेते हैं।


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